कोई आज मुझसे नज़रें चुराता क्यों है,

वो जो रहता था बनके कभी परछाई सी मेरी,

भीड़ का अनजान सा चेहरा नज़र आता क्यों है.

कोई आज मुझसे नज़रें चुराता क्यों है.

अकेलेपन का नाम सुनकर जो डर जाते थे कभी,

दूरियों के अहसास भर से जो सहम जाते थे कभी,

सानिध्य पाकर मेरा जिनके पलकों पे थिरक उठते आँसूं मोती बनकर,

उनके चेहरे पर आज ये ठण्ड-स्याह रात का मंज़र क्यों है.

वो जो रहता था बनके कभी परछाई सी मेरी,

भीड़ का अनजान सा चेहरा नज़र आता क्यों है.

कोई आज मुझसे नज़रें चुराता क्यों है.

जिनके क़दमों को पता था हर फासला मेरे घर का,

आज हर राह उनकी मेरे दरवाजे से दूर जाती है,

अपनी बातों को समझाने के वास्ते उन निगाहों का इशारा बहुत था,

आज शब्दों को कागज़ पर उकेरने की जरूरत क्यों है,

वो जो रहता था बनके कभी परछाई सी मेरी,

भीड़ का अनजान सा चेहरा नज़र आता क्यों है.

कोई आज मुझसे नज़रें चुराता क्यों है.

जिनको गंवारा न था कभी मुझसे दूर जाना,

कतराते है वो आज एक पल के सामने से,

आइना बना रक्खा था जिन्हों ने मेरे चेहरे को अपना,

आज वो आँखें मूँद कर अँधेरे में गुम हो जाते क्यों हैं,

वो जो रहता था बनके कभी परछाई सी मेरी,

भीड़ का अनजान सा चेहरा नज़र आता क्यों है.

कोई आज मुझसे नज़रें चुराता क्यों है.

Love – Ashish..

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