अब उन दिनों को ढूंढता हूँ मैं….जब चंद सांसें, नई सुबह को बचाने की जरूरत ना थी..अब उन दिनों को ढूंढता हूँ मैं….

जब तंग रास्तों पे चलते हुए, कदम डगमगाते ना थे,

जिंदगी किताबों की बस्तों की एक बोझ ना थी,

रिश्तों की गर्माहट एक उधार ना थी,

प्यार के सामानांतर अर्थ की कोई दौड़ती पटरी ना थी,

अब उन दिनों को ढूंढता हूँ मैं….जब चंद सांसें, नई सुबह को बचाने की जरूरत ना थी..एक रोटी से चार पेटों को भर पाना जब एक सच था

धरती आसमान का अंतर एक बरगद से ज्यादा ऊँचा ना था,

किसे याद रखने या किसे भूल जाने की कोई मुश्किल ना थी

और जब किसी के बाहों का दायरा इतना तंग ना था,

अब उन दिनों को ढूंढता हूँ मैं….

जब चंद सांसें, नई सुबह को बचाने की जरूरत ना थी..

अब उन दिनों को ढूंढता हूँ मैं….

Love – Ashish..

 

 

 

 

 

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